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Romantic Shayari for GF

  वक्त के इस मोड़ पर ये कैसा वक्त आया है,  ज़ख्म इस दिल का जुबां पर आया है,  नही रोते थे हम काँटों की चुभन से  आज फूलों की चुभन ने हमे रुलाया है दीवानगी मे कुछ ऐसा कर जाएंगे,  महोब्बत की सारी हदे पार कर जाएंगे,  वादा है तुमसे दिल बनकर तुम धड़कोगे,  और सांस बनकर हम आएँगे जन्म-जन्म जो साथ निभाए,  तुम ऐसा बंधन बंध जाओ, मैं बन जाऊं प्यार भरा दिल,  तुम दिल की धड़कन बन जाओ पहली मोहब्बत के लिए दिल जिसे चुनता है,  वो अपना हो न हो,  दिल पर राज हमेशा उसी का रहता है

आपके जज़्बात को जुबां देंगी ये शायरी

  अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ  अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ  - अनवर शऊर  एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें  और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं  - फ़िराक़ गोरखपुरी  नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती  मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं  - हसरत मोहानी  उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो  धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है  - राहत इंदौरी तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं  किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं  - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़  आप के बाद हर घड़ी हम ने  आप के साथ ही गुज़ारी है  - गुलज़ार  तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें  हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया  - बहादुर शाह ज़फ़र  चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है  हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है  - हसरत मोहानी  कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब  आज तुम याद बे-हिसाब आए  - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़  उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो  न जाने किस गली में ...

आपकी झील सी आंखों का क्या क़ुसूर

  कौन सा ग़म था जो ताज़ा न था इतना ग़म मिलेगा अंदाज़ा न था आपकी झील सी आंखों का क्या क़ुसूर डूबने वाले को ही गहराई का अंदाजा न था   कभी रज़ामंदी तो कभी बग़ावत है इश्क मोहब्बत राधा की है तो मीरा की इबादत है इश्क   कुछ नहीं है आज मेरे शब्दों के गुलदस्ते में  कभी-कभी मेरी ख़ामोशियां भी पढ़ लिया करो   बर्बाद कर गए वो जिंदगी प्यार के नाम से बेवफ़ाई ही मिली सिर्फ वफ़ा के नाम से   मत खोल मेरी क़िस्मत की किताब को हर उस शख़्स ने दिल दुखाया जिस पर नाज़ था   जिंदगी तेरी भी, अजब परिभाषा है संवर गई तो जन्नत, नहीं तो सिर्फ तमाशा है   ज़रा सी रंजिश पर न छोड़ किसी अपने का दामन ज़िंदगी बीत जाती है अपनों को अपना बनाने में   जाने उस शख़्स को कैसे ये हुनर आता है रात होती है तो आंखों में उतर आता है   दिन में न जाने कितनी बार होता है ऐसा तेरी याद आना और मेरा उदास हो जाना   उसकी बेरुख़ी ने छीन ली मेरी शरारतें लोग समझते हैं सुधर गया हूं मैं

यूं ही चलती रहेंगी ये दुनियां ,, हम ना होंगे तो कोई हमसा होगा.....

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उम्र भर बेचे खरीदे ही तो है दिल हमने  मशवरा करके लिया होता तो सस्ता पड़ता यहाँ वहाँ है ज़माने को अब तलाश मेरी.. मेरे वजूद के अंदर परी है लाश मेरी.!! कतराने लगा है अब, सवालों से दिल, ना जाने जवाब किसका, घाव कर जाए तेरी चाहत में रुसवा यूँ सरे बाजार हो गए.🖤 हमने ही दिल खोया और हम ही गुनहगार हो गए.💔 ज़माना सारा चाहे मेरी जितनी गजले पढ़े  वो एक शख़्स जो,ना पढे तो लिखना फिजूल है...!! तुम मिले तो हो  पर बहुत देर से मेरी कहानी अंतिम चरण पर है और तुम  आखिरी पन्ने का पहला शब्द बनकर आए हो! आज फिर घर में तेरा जिक्र हुआ...!!!🤷 आज फिर में बिना कुछ खाये ही सो गया...!!!😢💔 तुम पे मरने से लाख बेहतर ही था...!!!🤷 हम किसी हादसे में मर जाते..!!💔 हमने सूरज की रोशनी मे भी कभी अदब नहीं खोया,  कुछ लोग जुगनुओं की चमक में मग़रूर हो गये.. मैं मेरे घर की आखरी उम्मीद हूँ  वरना मैं तुम्हें बताता मोहब्बत मैं जान कैसे देते हैं ❣️ जरा सी आहट पे जाग जाता है वो रातो को, ऐ खुदा गरीब को बेटी दे तो दरवाज़ा भी दे।। लगाव कैसा भी हो .. बाद में दर्द ही देता है ... थोड़ी सी खुद्दार...

मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर

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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया वर्ना हम भी आदमी थे काम के मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब' कि लगाए न लगे और बुझाए न बने रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब' कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज मुश्किलें मुझ पर प...

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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  दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज 'फ़ैज़' मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो - राहत इंदौरी

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  आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो ले तो आए शाइरी बाज़ार में 'राहत' मियाँ क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो

तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो - ऐतबार साजिद

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 तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो किसी और को मिरे हाल से न ग़रज़ है कोई न वास्ता मैं बिखर गया हूँ समेट लो मैं बिगड़ गया हूँ सँवार दो

जब प्यार नहीं है तो भुला क्यूँ नहीं देते - हसरत जयपुरी

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  जब प्यार नहीं है तो भुला क्यूँ नहीं देते ख़त किस लिए रक्खे हैं जला क्यूँ नहीं देते किस वास्ते लिक्खा है हथेली पे मिरा नाम मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते लिल्लाह शब-ओ-रोज़ की उलझन से निकालो तुम मेरे नहीं हो तो बता क्यूँ नहीं देते रह रह के न तड़पाओ ऐ बे-दर्द मसीहा हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यूँ नहीं देते जब उस की वफ़ाओं पे यक़ीं तुम को नहीं है 'हसरत' को निगाहों से गिरा क्यूँ नहीं देते

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की - परवीन शाकिर

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  कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की उस ने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की