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Showing posts from January, 2025

Romantic Shayari for GF

  वक्त के इस मोड़ पर ये कैसा वक्त आया है,  ज़ख्म इस दिल का जुबां पर आया है,  नही रोते थे हम काँटों की चुभन से  आज फूलों की चुभन ने हमे रुलाया है दीवानगी मे कुछ ऐसा कर जाएंगे,  महोब्बत की सारी हदे पार कर जाएंगे,  वादा है तुमसे दिल बनकर तुम धड़कोगे,  और सांस बनकर हम आएँगे जन्म-जन्म जो साथ निभाए,  तुम ऐसा बंधन बंध जाओ, मैं बन जाऊं प्यार भरा दिल,  तुम दिल की धड़कन बन जाओ पहली मोहब्बत के लिए दिल जिसे चुनता है,  वो अपना हो न हो,  दिल पर राज हमेशा उसी का रहता है

आपके जज़्बात को जुबां देंगी ये शायरी

  अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ  अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ  - अनवर शऊर  एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें  और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं  - फ़िराक़ गोरखपुरी  नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती  मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं  - हसरत मोहानी  उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो  धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है  - राहत इंदौरी तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं  किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं  - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़  आप के बाद हर घड़ी हम ने  आप के साथ ही गुज़ारी है  - गुलज़ार  तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें  हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया  - बहादुर शाह ज़फ़र  चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है  हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है  - हसरत मोहानी  कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब  आज तुम याद बे-हिसाब आए  - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़  उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो  न जाने किस गली में ...

आपकी झील सी आंखों का क्या क़ुसूर

  कौन सा ग़म था जो ताज़ा न था इतना ग़म मिलेगा अंदाज़ा न था आपकी झील सी आंखों का क्या क़ुसूर डूबने वाले को ही गहराई का अंदाजा न था   कभी रज़ामंदी तो कभी बग़ावत है इश्क मोहब्बत राधा की है तो मीरा की इबादत है इश्क   कुछ नहीं है आज मेरे शब्दों के गुलदस्ते में  कभी-कभी मेरी ख़ामोशियां भी पढ़ लिया करो   बर्बाद कर गए वो जिंदगी प्यार के नाम से बेवफ़ाई ही मिली सिर्फ वफ़ा के नाम से   मत खोल मेरी क़िस्मत की किताब को हर उस शख़्स ने दिल दुखाया जिस पर नाज़ था   जिंदगी तेरी भी, अजब परिभाषा है संवर गई तो जन्नत, नहीं तो सिर्फ तमाशा है   ज़रा सी रंजिश पर न छोड़ किसी अपने का दामन ज़िंदगी बीत जाती है अपनों को अपना बनाने में   जाने उस शख़्स को कैसे ये हुनर आता है रात होती है तो आंखों में उतर आता है   दिन में न जाने कितनी बार होता है ऐसा तेरी याद आना और मेरा उदास हो जाना   उसकी बेरुख़ी ने छीन ली मेरी शरारतें लोग समझते हैं सुधर गया हूं मैं

यूं ही चलती रहेंगी ये दुनियां ,, हम ना होंगे तो कोई हमसा होगा.....

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उम्र भर बेचे खरीदे ही तो है दिल हमने  मशवरा करके लिया होता तो सस्ता पड़ता यहाँ वहाँ है ज़माने को अब तलाश मेरी.. मेरे वजूद के अंदर परी है लाश मेरी.!! कतराने लगा है अब, सवालों से दिल, ना जाने जवाब किसका, घाव कर जाए तेरी चाहत में रुसवा यूँ सरे बाजार हो गए.🖤 हमने ही दिल खोया और हम ही गुनहगार हो गए.💔 ज़माना सारा चाहे मेरी जितनी गजले पढ़े  वो एक शख़्स जो,ना पढे तो लिखना फिजूल है...!! तुम मिले तो हो  पर बहुत देर से मेरी कहानी अंतिम चरण पर है और तुम  आखिरी पन्ने का पहला शब्द बनकर आए हो! आज फिर घर में तेरा जिक्र हुआ...!!!🤷 आज फिर में बिना कुछ खाये ही सो गया...!!!😢💔 तुम पे मरने से लाख बेहतर ही था...!!!🤷 हम किसी हादसे में मर जाते..!!💔 हमने सूरज की रोशनी मे भी कभी अदब नहीं खोया,  कुछ लोग जुगनुओं की चमक में मग़रूर हो गये.. मैं मेरे घर की आखरी उम्मीद हूँ  वरना मैं तुम्हें बताता मोहब्बत मैं जान कैसे देते हैं ❣️ जरा सी आहट पे जाग जाता है वो रातो को, ऐ खुदा गरीब को बेटी दे तो दरवाज़ा भी दे।। लगाव कैसा भी हो .. बाद में दर्द ही देता है ... थोड़ी सी खुद्दार...

मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर

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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया वर्ना हम भी आदमी थे काम के मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब' कि लगाए न लगे और बुझाए न बने रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब' कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज मुश्किलें मुझ पर प...

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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  दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज 'फ़ैज़' मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो - राहत इंदौरी

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  आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो ले तो आए शाइरी बाज़ार में 'राहत' मियाँ क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो

तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो - ऐतबार साजिद

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 तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो किसी और को मिरे हाल से न ग़रज़ है कोई न वास्ता मैं बिखर गया हूँ समेट लो मैं बिगड़ गया हूँ सँवार दो

जब प्यार नहीं है तो भुला क्यूँ नहीं देते - हसरत जयपुरी

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  जब प्यार नहीं है तो भुला क्यूँ नहीं देते ख़त किस लिए रक्खे हैं जला क्यूँ नहीं देते किस वास्ते लिक्खा है हथेली पे मिरा नाम मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते लिल्लाह शब-ओ-रोज़ की उलझन से निकालो तुम मेरे नहीं हो तो बता क्यूँ नहीं देते रह रह के न तड़पाओ ऐ बे-दर्द मसीहा हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यूँ नहीं देते जब उस की वफ़ाओं पे यक़ीं तुम को नहीं है 'हसरत' को निगाहों से गिरा क्यूँ नहीं देते

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की - परवीन शाकिर

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  कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की उस ने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की

इतनी मुद्दत बा'द मिले हो - मोहसिन नक़वी

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इतनी मुद्दत बा'द मिले हो किन सोचों में गुम फिरते हो इतने ख़ाइफ़ क्यूँ रहते हो हर आहट से डर जाते हो तेज़ हवा ने मुझ से पूछा रेत पे क्या लिखते रहते हो काश कोई हम से भी पूछे रात गए तक क्यूँ जागे हो में दरिया से भी डरता हूँ तुम दरिया से भी गहरे हो कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँ लगते हो पीछे मुड़ कर क्यूँ देखा था पत्थर बन कर क्या तकते हो जाओ जीत का जश्न मनाओ में झूटा हूँ तुम सच्चे हो अपने शहर के सब लोगों से मेरी ख़ातिर क्यूँ उलझे हो कहने को रहते हो दिल में फिर भी कितने दूर खड़े हो रात हमें कुछ याद नहीं था रात बहुत ही याद आए हो हम से न पूछो हिज्र के क़िस्से अपनी कहो अब तुम कैसे हो 'मोहसिन' तुम बदनाम बहुत हो जैसे हो फिर भी अच्छे हो

यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो - बशीर बद्र

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यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियाँ जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो कभी हुस्न-ए-पर्दा-नशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में जो मैं बन सँवर के कहीं चलूँ मिरे साथ तुम भी चला करो नहीं बे-हिजाब वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर न हो उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो ये ख़िज़ाँ की ज़र्द सी शाल में जो उदास पेड़ के पास है ये तुम्हारे घर की बहार है उसे आँसुओं से हरा करो

कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे - जौन एलिया

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  कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या - जौन एलिया

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  उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नुक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं - अहमद फ़राज़

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  सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखत...

दिल को छू जाने वाली इन दो लाइन

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  यानी अब उसकी मुहब्बत का हलफ़ माँगूँ मैं यानी अब सुर्ख लबों पे मैं सियाही फेंकूँ तिरे इश्क की इंतिहा चाहता हूँ मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ हर वक्त तेरा ही तेरा ख्याल आता है तेरी यादें कोई EMI है किश्तों में घंटे घंटे आती है। ये तो जमीं की आदत है की हर चीज़ को समा देती है तेरी याद में गिरने वाले आंसुओं का अलग समंदर होता। उसने एक और दर्द दिया तो खुदा याद आएगा कि हमने भी दुआओं  में उनके सारे गम मांगे थे. सरहदें तोड़ के आ जाती है किसी पंछी की तरह,  ये तेरी याद है जो बंटती नहीं मुल्कों की तरह। दिल का हाल बताना नही आता, किसी को ऐसे तड़पना नही आता,  सुनना चाहते है एक बार आवाज आपकी, मगर बात करने का बहाना नही आता…!! इश्क की गलियों में लापता ना हो जनाब गलियों का क्या भरोसा कब कहां मुड़ जाए..!! जीने का मजा तो सबके साथ आता है अकेले तो सिर्फ जिंदगी गुजारी जाती है..!! हम उनसे खफा क्या हुए उसने तो हमारे हर निशान को मिटा दिया..!! हमें गम के सागर से निकालने की कोशिश ना कीजिए खुद ही डूब जाओगे..!! हमसे ना पूछो किसी का पता हम तो खुद लापता है उनके इश्क की गलियों में..!! खुदगर्ज हुआ करत...