चलो आज फिर थोडा मुस्कुराया जाये , बिना माचिस के कुछ लोगो को जलाया जाये .....!!! जैसा भी हूं अच्छा या बुरा अपने लिये हूं , मै खुद को नही देखता औरो की नजर से ….!!! बस इतनी सी बात पर हमारा परिचय तमाम होता है , हम उस रास्ते नही जाते जो रास्ता आम होता है …........!!! ये मत समझ कि तेरे काबिल नहीं हैं हम , तड़प रहे हैं वो जिसे हासिल नहीं हैं हम .....!!! आग लगाना मेरी फितरत में नही है , मेरी सादगी से लोग जलें तो मेरा क्या कसूर ......!!! लोग मुझे अपने होंठों से लगाए हुए हैं , मेरी शोहरत किसी के नाम की मोहताज नहीं ......!!! लाख तलवारे बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ , सर झुकाना नहीं आता तो झुकाए कैसे .........!!! हम तो इतने रोमान्टिक है की हम अगर थोड़ी देर , मोबाइल हाथ मै लेले .. तो वो भी गरम हो जाता है ......!!! सर झुकाने की आदत नहीं है , आँसू बहाने की आदत नहीं है , हम खो गए तो पछताओगे बहुत , क्युकी हमारी लौट के आने की आदत नहीं है ......!!! ...
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया वर्ना हम भी आदमी थे काम के मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब' कि लगाए न लगे और बुझाए न बने रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब' कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज मुश्किलें मुझ पर प...
कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की उस ने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की
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